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Thursday, September 14, 2023

Rashmirathi tratiya sarg, रश्मीरथी तृतीय सर्ग ,ho gaya purn agyatwas pandav lote wan se sahas, हो गया पुर्ण अज्ञातवास पांडव लौटे वन से सहास रामधारी सिंह दिनकर जी

       रश्मिरथी तृतीय सर्ग



हो  गया  पूर्ण  अज्ञात   वास , 
पांडव  लोटे  वन  से   सहास, 
पावक में कनक-सद्रश तपकर , 
विरत्व  लिए  कुछ  और  प्रखर। 
              नस-नस में तेज प्रवाह लिए , 
              कुछ और नया उत्साह लिए । 


सच है, विपत्ति जब आती है , 
कायर   को  ही   दहलाती है , 
शूरमा  नहीं  विचलित   होते , 
क्षण  एक  नहीं  धीरज खोते । 
              विघ्नों को गले लगाते हैं , 
              कांटों  में  राह  बनाते हैं । 


मुख से न कभी उफ् कहते हैं , 
संकट  का  चरण न  गहते हैं , 
जो आ पड़ता , सब  सहते हैं , 
उद्योग - निरत  नित  रहते  हैं । 
              शूलों   का  मूल  नसाने  को , 
              बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को । 


है  कौन  विघ्न ऐसा   जग में, 
टिक सके  वीर नर के मग में , 
खम  ठोक  ठेलता है जब नर , 
पर्वत  के  जाते  पाँव   उखड़ । 
              मानव जब जोर लगाता है, 
              पत्थर पानी  बन जाता है। 


गुण बड़े एक से एक प्रखर, 
है छिपे मानवों  के  भीतर , 
मेहंदी में  जैसे  लाली  हो , 
वर्तिका-बीच उजियाली हो । 
              बत्ती जो नहीं  जलाता  है , 
              रोशनी नहीं हुआ पाता है। 



पीसा जाता जब इक्षु- दण्ड, 
झरति रस की धारा अखंड , 
मेहंदी जब सहती  है प्रहार , 
बनती ललनाओं का शृंगार। 
                 जब फूल पिरोये जाते हैं , 
                 हम उनको गले लगाते हैं । 


वसुधा का नेता  कौन    हुआ ? 
भूखंड - विजेता  कौन   हुआ ? 
अतुलित यश-क्रेता कौन हुआ ? 
नव - धर्म - प्रणेता  कौन हुआ ? 
              जिसने न कभी आराम किया , 
              विघ्नों में रहकर नाम   किया । 


जब विघ्न सामने आते हैं , 
सोते  से  हमें  जगाते   हैं , 
मन को मरोड़ते हैं पल-पल , 
तन को झंझोड़ते हैं पल-पल । 
                सत्पथ की ओर लगाकर ही , 
                जाते  हैं  हमें   जगा कर  ही। 


वाटिका और वन एक नहीं , 
आराम और रण एक नहीं , 
वर्षा, अंधड़, आतप ,अखंड, 
पौरुष के है साधन प्रचंड  । 
                वन में प्रसून तो खिलते हैं , 
                बागों में शाल न मिलते हैं  । 


कंकरिया जिनकी सेज सुघर, 
छाया   देता   केवल  अंबर , 
विपदाएं   दूध   पिलाती  है , 
लोरी आंधियां   सुनाती   है । 
                जो लाक्षा ग्रह में जलते हैं , 
                वे  ही शूरमा  निकलते हैं । 


बढ़कर विपत्तियों पर छाजा , 
मेरे     किशोर    मेरे   ताजा, 
जीवन   का रस छन जाने दे , 
तन को पत्थर  बन  जाने  दे । 
                तू स्वयं  तेज  भयकारि  है , 
                क्या कर सकती चिंगारी है। 



            जय हिन्द

Rashmirathi tratiya sarg, रश्मीरथी तृतीय सर्ग ,ho gaya purn agyatwas pandav lote wan se sahas, हो गया पुर्ण अज्ञातवास पांडव लौटे वन से सहास रामधारी सिंह दिनकर जी

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